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103 साल की महिला, जिसने ज़मीन के लिए लड़ी 32 साल की क़ानूनी लड़ाई
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 5 मिनट
हबीबन खातून आजकल बहुत सुकून में हैं. बीते 32 साल में ये पहला मौका है जब उनका मन शांत है.
हबीबन के 56 साल के बेटे रहमतुल्लाह ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया कि उनकी अम्मी की उम्र 103 साल से ज्यादा हो गई है और वे बोल-सुन नहीं सकतीं.
रहमतुल्लाह ने कहा कि उनकी अम्मी इस फ़ैसले से बहुत खुश हैं. हबीबन ने अपने गहने बेचकर ज़मीन खरीदी थी. उन्हें अपनी ज़मीन पर 32 साल बाद कब्जा मिल पाया है.
103 साल की हबीबन ने 32 साल तक एक कट्ठा चार धुर (करीब 1633 वर्ग फ़ुट) ज़मीन के लिए लंबी लड़ाई लड़ी.
क्या है पूरा मामला
बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) ज़िले के कल्याणपुर ब्लॉक में मंगलापुर नाम का गांव है. इस गांव में नईमुल्लाह अंसारी और उनकी पत्नी हबीबन खातून रहते थे.
नईमुल्लाह अंसारी असम में फल बेचते थे. इस दंपत्ति के चार बेटे और एक बेटी है.
नईमुल्लाह अंसारी ने छह मार्च 1993 को मंगलापुर के ही रहने वाले अफाक अख्तर नाम के व्यक्ति से 1 कट्ठा 4 धुर ज़मीन खरीदी थी.
इसके ठीक दो दिन बाद यानी 8 मार्च 1993 को नईमुल्लाह अंसारी के चचेरे भाई लियाकत हुसैन ने भी इसी जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली. ज़मीन का ये विवाद यहीं से शुरू हुआ.
जब विवाद बढ़ा तो नईमुल्लाह अंसारी ने मोतिहारी के मुंसिफ कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया. मुंसिफ कोर्ट दीवानी मामलों की सब से निचली अदालत होती है.
हबीबन के बेटे रहमतुल्लाह बताते हैं, "मुंसिफ कोर्ट ने हमारे पक्ष में फ़ैसला सुनाया. फिर ये मामला ज़िला जज के कोर्ट में गया, वहां से भी 2004 में हमारे पक्ष में फ़ैसला आया."
कोर्ट के चक्कर लगाता रहा परिवार
नईमुल्लाह अंसारी के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद लियाकत हुसैन ने साल 2010 में पटना हाईकोर्ट में इसके ख़िलाफ़ अपील दर्ज की. अगस्त 2014 में जज किशोर कुमार मंडल ने लियाकत हुसैन की अपील ख़ारिज कर दी.
रहमतुल्लाह बताते हैं, "हाईकोर्ट से लियाकत हुसैन की अपील ख़ारिज होने के बाद हम लोगों ने मुंसिफ सदर के यहां इजराय (एक्ज़ीक्यूशन पिटीशन) दायर की. लेकिन फिर कोविड आ गया और मुंसिफ सदर लगातार बदलते रहे. जिसके बाद ये फ़ैसला लागू ही नहीं हो पाया."
मुंसिफ सदर ज़िला मुख्यालय में मुख्य सिविल जज होते हैं. ये जज संपत्ति, ज़मीन आदि से जुड़े छोटे मामलों की सुनवाई करते हैं.
मुंसिफ सदर के यहां इजराय की अपील का मतलब उस प्रक्रिया से है जहां आप पिछली अदालत के फ़ैसले को लागू करने की गुहार करते हैं.
2014 में हाईकोर्ट का फ़ैसला, 2026 में लागू
साल 2014 में हाईकोर्ट ने लियाक़त हुसैन की अपील ख़ारिज कर दी थी, लेकिन हबीबन खातून के हक़ में फ़ैसला हाईकोर्ट के आदेश के 12 साल बाद लागू हुआ.
पूर्वी चंपारण के सत्र न्यायाधीश के कार्यालय ने बीती 4 जून को एक पत्र निकालकर 12 जून को कोर्ट ऑर्डर लागू करने का आदेश दिया.
जिसके बाद 12 जून को प्रशासनिक दल – बल की उपस्थिति में हबीबन खातून की जमीन को कब्जा मुक्त कराया गया.
मौके पर मौजूद कल्याणपुर के थाना प्रभारी विनीत कुमार ने पत्रकारों से कहा, "न्यायालय के आदेश का पालन करवाना हमारी ज़िम्मेदारी थी. अदालत के आदेश पर सारी औपचारिकताएं पूरी करने के लिए बाद संबधित ज़मीन पर दखल दिहानी (ज़मीन के असली मालिक को कब्जा दिलाना) कराई गई."
लकड़ी का काम करने वाले लियाकत हुसैन, हबीबन खातून की ज़मीन पर रहते थे. इस ज़मीन पर झोपड़ी बनी हुई थी. जिसे प्रशासन ने हटाया.
इस सारे मामले पर रहमतुल्लाह कहते हैं, "हाईकोर्ट का फ़ैसला आने के बाद लियाकत हुसैन तो घर आकर चुपचाप बैठ गया था. हम लोग कोर्ट में कोशिश करते रहे. मेरी मां 97 साल की उम्र में भी मुंसिफ कोर्ट जाती रहीं. लेकिन मुंसिफ सदर के लगातार तबादले होते रहे और हमारी सुनवाई ही नहीं हो पाई. जिसके चलते इजराय की अपील ऐसे ही पड़ी रही."
ज़मीन का कब्ज़ा मिलने पर ख़ुशी
नईमुल्लाह अंसारी और हबीबन खातून के सबसे छोटे बेटे रहमतुल्लाह हैं.
इस परिवार के पास खेती योग्य ज़मीन नहीं है. रहमतुल्लाह के दो भाई मज़दूरी करते हैं. जबकि रहमतुल्लाह कल्याणपुर पोस्टऑफिस में पोस्टमास्टर और एक भाई सेना से रिटायर है.
रहमतुल्लाह कहते हैं, "अम्मा खुश तो हैं लेकिन ये खुशी तब और ज़्यादा होती, जब पिताजी रहते. वो तकरीबन दस साल पहले गुजर गए. अम्मा और पिताजी ने बहुत मुश्किल से ये ज़मीन खरीदी थी."
पटना से आर्थिक मामलों पर निकलने वाली पत्रिका तलाश की संपादक मीरा दत्त कहती हैं, "ये क्लासिक उदाहरण है कि हमारी कानूनी प्रक्रिया कितनी जटिल है और एक आम आदमी कैसे उसमें फंस कर रह जाता है. इस मामले में न्याय मिलकर भी न्याय नहीं हुआ."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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