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सतलुज महज़ फ़िल्म नहीं बल्कि वो नदी है जिसने कई सभ्यताओं को बनते और मिटते देखा
- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
"सतलुज की हवा,
जो मेरे गाँव के खेतों से होकर गुज़रती है,
और याद दिलाती है उन सब की,
जो इस माटी के लिए लड़े और मिट गए."
क्रांतिकारी कवि लालसिंह दिल की मशहूर पंजाबी कविता "सतलज दी हवा" का यह हिस्सा बताता है कि एक स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म से हटाई गई फ़िल्म ने ही उस नदी की ओर ध्यान नहीं खींचा, जो हिमालय से भी पुरानी भूगर्भीय स्मृतियों, लुप्त नदी-मार्गों, सभ्यताओं, साम्राज्यों, युद्धों और विभाजित राष्ट्रों की कहानी अपने साथ बहाती रही है, इससे पहले भी वह लोगों का ध्यान खींचती रही है.
फ़िल्म का पोस्टर किसी डिजिटल कैटलॉग से हटाया जा सकता है; नदी को इतिहास के कैटलॉग से नहीं हटाया जा सकता.
फ़िल्म सतलुज में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा की भूमिका निभाई है, उस मानवाधिकार कार्यकर्ता की, जिसने सरकारी काग़ज़ों, श्मशान-रजिस्टरों, नगर निकायों की रसीदों और अज्ञात शवों की सूचियों के सहारे भारत के हाल के इतिहास के सबसे विचलित कर देने वाले अध्यायों में से एक को खोला था.
लेकिन जिस "सतलुज" से फ़िल्म ने नाम लिया था, वह तिब्बत के निर्जन विस्तार से हिमालय की चट्टानों को काटकर पंजाब के मैदानों से पाकिस्तान में प्रवेश करती है और सिंधु की विराट जल-व्यवस्था में समा जाती है.
पाकिस्तानी लेखक शाहबाज़ बहावलपुरी ने लिखा है, "सतलुज पंजाब के ऐतिहासिक क्रॉसरोड क्षेत्र में बहने वाली पाँच नदियों में सबसे लंबी और साझा विरासत है."
प्रख्यात पंजाबी साहित्यकार देवेंद्र सत्यार्थी ने लिखा था, "सतलुज की एक झलक मनुष्य के अहंकार को छोटा कर देती है. यह पृथ्वी की अपनी ही सतह पर लिखी गतिशील पांडुलिपि है, जिसके अक्षर कभी हिमनद हैं, कभी घाटियाँ, कभी सूखे हुए प्राचीन नदी-पाट और कभी वे नगर, जो उसके किनारों पर उठे और मिट गए."
एक नदी के कई नाम
सतलुज का उद्गम कैलाश-मानसरोवर के निकट फैले ऊँचे, शुष्क और लगभग अलौकिक भूक्षेत्र में होता है.
तिब्बत में उसे लांगचेन ज़ांग्बो कहा जाता है. वह पश्चिम की ओर बढ़ती है और शिपकी ला के निकट भारत में प्रवेश करके किन्नौर की गहरी घाटियों में उतरती है.
वहाँ नदी किसी मैदान की परिचित जलधारा नहीं दिखाई देती; वह मानो पत्थर के भीतर चलती हुई कोई प्राचीन शक्ति हो.
भूवैज्ञानिक सतलुज को हिमालय की उन "पूर्ववर्ती" नदियों में रखते हैं जिनकी जल-व्यवस्था का निर्माण वर्तमान पर्वतीय भूगोल के पूर्ण रूप लेने से पहले शुरू हो चुका था. इसलिए यह भी दावा किया जाता है कि सतलुज और हिमालय एक-दूसरे को बनाते हुए विकसित हुए.
कह सकते हैं कि जैसे-जैसे धरती की पपड़ी उठी, नदी पीछे नहीं हटी; उसने उभरती हुई पर्वत-श्रेणियों को काटते हुए अपने लिए गहरी घाटियाँ बनाईं. कुछ स्थानों पर वह पर्वत के सबसे ऊँचे और कठोर हिस्सों को लगभग अनुपयुक्त कोण पर चीरती हुई निकलती है- मानो पानी ने पत्थर से कहा हो कि तुम्हारी ऊँचाई मेरी दिशा नहीं बदल सकती.
पश्चिमी हिमालय की प्राचीन नदी-व्यवस्था और सतलुज के सिंधु-तंत्र से जुड़ने की प्रक्रिया पर सबसे महत्वपूर्ण अध्ययन पीटर डॉमिनिक क्लिफ्ट और जर्जी एस. ब्लुश्टाइन का शोध-पत्र 'रीऑर्गनाइज़ेशन ऑफ द वेस्टर्न हिमालयन रिवर सिस्टम आफ्टर फाइव मिलियन इयर्स अगो' है, जो 2005 में प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका 'नेचर' में प्रकाशित हुआ.
अरब सागर से प्राप्त तलछट और आइसोटोप आँकड़ों के आधार पर यह अध्ययन बताता है कि लगभग पचास लाख वर्ष पहले पश्चिमी हिमालय की नदियों का व्यापक पुनर्गठन हुआ और आदिम सतलुज पश्चिम की ओर मुड़कर सिंधु नदी-प्रणाली का हिस्सा बनी.
लीला मारिया वेस्पोली द कार्वाल्हो और चार्ल्स जोन्स की 'द मॉनसून्स एंड क्लाइमेट चेंज: ऑब्ज़र्वेशन्स एंड मॉडलिंग' और पीटर डॉमिनिक क्लिफ्ट तथा तारा एन. जोनेल के भूगर्भीय अनुसंधान बताते हैं कि आज हम जिस सतलुज को जानते हैं, वह केवल बहता हुआ पानी नहीं; वह लाखों वर्ष पहले हुए एक भूगर्भीय रिवर कैप्चर की जीवित परिणति है.
सभ्यताओं का भूगोल बदलने वाली नदी
और यहीं उसकी कहानी और भी विस्मयकारी हो जाती है. क्योंकि सतलुज ने केवल पर्वत नहीं काटे; उसने अपना रास्ता बदलकर सभ्यताओं का भूगोल भी बदला है.
उसका एक बड़ा प्रवाह वर्तमान मार्ग से बहुत दूर दक्षिण-पूर्व की ओर जाता हुआ घग्घर-हाकड़ा प्रणाली में प्रवेश करता था.
अर्थात् आज पंजाब और पाकिस्तान की ओर बहने वाली नदी ने किसी समय हरियाणा, राजस्थान और चोलिस्तान की दिशा में अपना विशाल जल बहाया था. बाद में वह पुराने नदी-पाट को छोड़कर पश्चिम की ओर मुड़ गई.
इसके समानांतर भारतीय साहित्य ने नदी की बेचैनी को अपने ढंग से याद रखा.
वैदिक साहित्य में उसका नाम शुतुद्री के रूप में मिलता है. महाभारत में वह शतद्रु है-"सौ धाराओं वाली नदी."
इससे पहले कथा है कि ऋषि वसिष्ठ अपने दुःख में नदी में कूद पड़े; लेकिन नदी उन्हें अग्नि के समान प्रचंड समझकर सौ धाराओं में विभक्त हो गई और उन्हें मरने नहीं दिया.
कह सकते हैं कि सतलुज इस प्रकार एक साथ दो भाषाओं में लिखी हुई नदी है.
चट्टानों की भाषा में वह प्रवाह-परिवर्तन और अवसाद की कथा है; महाकाव्य की भाषा में वह सौ भुजाएँ फैलाकर एक दुःखी मनुष्य को बचाने वाली नदी है.
कैलाश के पश्चिम में ऊपरी सतलुज घाटी प्राचीन झांगझुंग सभ्यता से जुड़ी रही है.
तिब्बती बोन परंपरा में झांगझुंग एक शक्तिशाली सांस्कृतिक संसार था, जिसकी स्मृतियाँ पश्चिमी तिब्बत, लद्दाख और हिमालयी दर्रों तक फैली हुई हैं.
सतलुज के निकट क्यूंगलुंग को "गरुड़ का रजत महल" कहा गया. उसके खंडहर इसी रहस्यमय सभ्यता से जोड़े जाते हैं.
भारत में प्रवेश के बाद भी नदी ने सीमा की तरह नहीं, बीहड़ों में रास्ते की तरह काम किया.
शिपकी ला के कठिन मार्ग से सदियों तक व्यापारी, चरवाहे और यात्री आते-जाते रहे.
तिब्बत से ऊन और नमक उतरता था; भारतीय क्षेत्र से अनाज, गुड़ और दूसरी आवश्यक वस्तुएँ ऊपर जाती थीं.
महापंडित राहुल सांकृत्यायन इन्हीं रास्तों से हज़ारों तिब्बती बौद्धग्रंथों की पांडुलिपियों को खच्चरों पर लादकर बिहार लेकर आए थे.
1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इन पारंपरिक मार्गों पर कठोर सीमा उतर आई.
वह रास्ता, जिस पर कभी पशुओं की घंटियों और कारवाँ की आवाज़ सुनाई देती थी, सैनिक चौकियों और अनुमति-पत्रों के भूगोल में बदल गया.
1990 के दशक में सीमित व्यापार फिर आरंभ हुआ, लेकिन पुरानी दुनिया लौट नहीं सकी.
सतलुज यहाँ भी इतिहास का वही नियम दिखाती है: मनुष्य जिस जगह सीमा बनाता है, नदी वहाँ संबंध का पुराना प्रमाण छोड़ जाती है.
पहाड़ों से मैदान में उतरते ही सतलुज का चरित्र बदलता है.
सतलुज का बदलता चरित्र
सतलुज केवल जीवनदायी धारा नहीं रही; कई बार उसने तय किया कि साम्राज्य कहाँ समाप्त होगा और दूसरा प्रभुत्व कहाँ से शुरू होगा.
1809 में महाराजा रणजीत सिंह और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई अमृतसर की संधि ने सतलुज को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सीमा बना दिया.
25 अप्रैल 1809 को ब्रिटिश प्रतिनिधि चार्ल्स टी. मेटकाफ़ और महाराजा रणजीत सिंह के बीच अमृतसर में संधि के दस्तावेज़ इसकी पुष्टि करते हैं.
जोसेफ डेवी कनिंघम की "हिस्ट्री ऑफ़ सिख्स" और सिख इतिहास के जानकार पूर्व राज्यसभा सांसद और पूर्व अल्पसंख्यक आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष तरलोचन सिंह का तो यह भी तर्क है कि किस तरह एक सिख शासक के अधीन बहुसंख्यक इस्लामिक प्रजा अमन-चैन और प्रसन्नता से रह रही थी; क्योंकि इन्सानियत ही सतलुज के पानी की तासीर है.
नदी के पश्चिम में रणजीत सिंह की शक्ति मान्य हुई, जबकि पूर्व के राज्यों पर ब्रिटिश संरक्षण बढ़ा.
यह एक असाधारण क्षण था: करोड़ों वर्ष की भूगर्भीय यात्रा से बनी जलधारा को कुछ अनुच्छेदों की संधि ने साम्राज्य की रेखा में बदल दिया.
लेकिन नदी से बना यह अंतराल स्थायी नहीं था. दिसंबर 1845 में खालसा सेना ने सतलुज पार की.
ब्रिटिश सत्ता ने इस पार-गमन को युद्ध की घोषणा की तरह पढ़ा और प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध आरंभ हो गया.
युद्ध की निर्णायक लड़ाई फरवरी 1846 में सोबराँव के निकट सतलुज के किनारे लड़ी गई.
सिख सेना ने सतलुज के पास मज़बूत मोर्चा बनाया था और पीछे जाने के लिए नौकाओं पर आधारित एक अस्थायी पुल था.
कई जगहों पर इसका ज़िक्र है कि सतलुज लगातार वर्षा से उफन रही थी. युद्ध के दौरान पुल टूट गया. पीछे हटते अनेक सैनिक नदी और शत्रु के बीच फँस गए. पानी, जो कुछ समय पहले रक्षा-रेखा था, अचानक मृत्यु की दीवार बन गया.
सोबराँव में पराजय ने लाहौर दरबार की शक्ति तोड़ दी और प्रथम एंग्लो-सिख युद्ध के अंत का मार्ग बनाया.
इस लड़ाई की ब्रिटिश चित्रकला में सतलुज पृष्ठभूमि दिखाई देती है, लेकिन वास्तविक इतिहास में नदी पृष्ठभूमि नहीं थी.
वह युद्ध की एक सक्रिय शक्ति थी- सीमा, खाई, वापसी का मार्ग और अंततः जाल.
ब्रिटिशर्स ने पंजाब पर विजय प्राप्त करने के बाद सतलुज को केवल नदी नहीं समझा. उन्होंने उसे नापी जा सकने वाली आय, नियंत्रित श्रम और नए कृषि-भूगोल में बदलने की संभावना के रूप में देखा.
नदी को नहरों, हेडवर्क्स और राजस्व अभिलेखों में अनूदित किया गया. वृहत्तर पंजाब, बहावलपुर और बीकानेर रियासत तक नहरों के जाल बिछा दिए गए.
बीसवीं सदी के आरंभ में सतलुज वैली प्रोजेक्ट औपनिवेशिक भारत की सबसे महत्वाकांक्षी सिंचाई योजनाओं में शामिल हुआ.
यह ब्रिटिश पंजाब, बहावलपुर और बीकानेर से जुड़ी एक विशाल परियोजना थी.
चार प्रमुख हेडवर्क्स और ग्यारह नहरों की योजना के माध्यम से लाखों एकड़ शुष्क भूमि तक पानी पहुँचाने की कल्पना की गई.
यह परियोजना केवल सिंचाई नहीं थी; यह समाज-निर्माण का औपनिवेशिक प्रयोग थी.
नहर के साथ नई बस्तियाँ आईं, खेतों की नई सीमाएँ बनीं, भूमि का मूल्य बदला, प्रवास हुआ और राजस्व की नई प्रणालियाँ खड़ी हुईं.
बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह के लिए सतलुज का पानी अकाल से त्रस्त राज्य को बचाने का माध्यम था.
बहावलपुर के लिए वह रेगिस्तानी भूमि को कृषि-क्षेत्र में बदलने वाली शक्ति थी.
ब्रिटिश शासन के लिए वह राजस्व, कपास, गेहूँ और राजनीतिक नियंत्रण का स्रोत था.
एक ही पानी तीन अलग-अलग कल्पनाओं में बह रहा था—जीवन-रक्षा, राज्य-निर्माण और साम्राज्यिक लाभ.
नहरों ने समृद्धि पैदा की, लेकिन साथ ही एक नया सामाजिक अनुशासन भी बनाया.
पानी किसे मिलेगा, कितनी देर मिलेगा, कौन-सी भूमि "कमांड एरिया"में आएगी और कौन-सी बाहर रह जाएगी—इन निर्णयों ने किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच नए शक्ति-संबंध रचे.
1947 में पंजाब को विभाजित करते समय मनुष्यों, ज़मीनों और नगरों के साथ जल-व्यवस्था भी काटी गई.
लेकिन नहरों का भूगोल धार्मिक जनसंख्या के नक़्शे के अनुसार नहीं बना था. किसी नहर का हेडवर्क भारत में रह गया, जबकि उससे सिंचित खेत पाकिस्तान में चले गए.
सीमा ने नियंत्रण को एक देश और निर्भरता को दूसरे देश में रख दिया. फ़ीरोज़पुर के हेडवर्क्स इसका सबसे नाटकीय उदाहरण बने.
क्या है सिंधु जल संधि
अप्रैल 1948 में एक अंतरिम व्यवस्था समाप्त होने के बाद पूर्वी पंजाब ने दीपालपुर नहर और ऊपरी बारी दोआब प्रणाली की कुछ पाकिस्तानी शाखाओं की जलापूर्ति रोक दी.
विभाजन की हिंसा के केवल आठ महीने बाद नदी ने दोनों देशों को बताया कि राजनीतिक स्वतंत्रता जल-निर्भरता को समाप्त नहीं करती.
1960 की सिंधु जल संधि ने एक असाधारण लेकिन कठोर समाधान प्रस्तुत किया.
रावी, ब्यास और सतलुज जैसी पूर्वी नदियों का मुख्य उपयोग भारत को मिला; सिंधु, झेलम और चिनाब जैसी पश्चिमी नदियाँ मुख्यतः पाकिस्तान के हिस्से में आईं.
स्वतंत्र भारत ने सतलुज में साम्राज्य की आय से भिन्न सपना देखा. भाखड़ा-नांगल परियोजना में नदी राष्ट्रीय पुनर्निर्माण, बिजली, सिंचाई और खाद्य-सुरक्षा की शक्ति बनी.
हिमालयी दर्रे में खड़ी विशाल कंक्रीट की दीवार उस युग के विश्वास का स्मारक थी, जिसमें लगता था कि वैज्ञानिक योजना भारत को भूख, अकाल और पिछड़ेपन से मुक्त कर सकती है.
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भाखड़ा को पुनरुत्थानशील भारत का नया मंदिर कहा. यह वाक्य केवल बाँध की प्रशंसा नहीं था.
यह आधुनिकता की नई धार्मिक भाषा थी: अब चमत्कार देवता नहीं, अभियंता करेंगे; अब पवित्रता प्राचीन अवशेष में नहीं, बिजलीघर और सिंचाई नहर में होगी.
भाखड़ा ने वास्तव में उत्तर भारत को बदला. बिजली पैदा हुई. नहरों का विस्तार हुआ. पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के खेतों को पानी मिला. बाद में हरित क्रांति की उच्च उपज वाली खेती को जिस नियंत्रित सिंचाई की आवश्यकता थी, उसमें सतलुज का निर्णायक योगदान था. भारत की खाद्य-असुरक्षा कम हुई और पंजाब राष्ट्रीय अन्न-भंडार बन गया.
लेकिन सतलुज जैसी नदियों को मंदिर बनाने की भी एक मानवीय कीमत थी.
जलाशय के नीचे पुराना बिलासपुर नगर, गाँव, रास्ते, खेत और स्मृतियाँ चली गईं. विस्थापित लोगों के लिए राष्ट्रीय विकास किसी बाँध की ऊँचाई नहीं था; वह पानी के नीचे छूट गया घर था.
आधुनिक भारत ने सतलुज से अन्न और बिजली ली, लेकिन बदले में उसे अपनी ऋतुओं का स्वाधीन क्रम छोड़ना पड़ा.
बाँध के नीचे नदी अब बर्फ़, वर्षा और मौसम के अनुसार नहीं, टर्बाइन, जलाशय और सिंचाई-आदेश के अनुसार बहने लगी.
यहीं सतलुज के इतिहास की सबसे गहरी विडंबना है. जिस नदी ने पर्वतों को काटकर अपना मार्ग बनाया था, आधुनिक मनुष्य ने उसके सामने कंक्रीट की दीवार खड़ी कर दी.
आज सतलुज के ऊपरी प्रवाह पर जलविद्युत परियोजनाओं, सुरंगों और सड़कों की शृंखला है. मैदानों में उसके पानी को नहरें दूर-दूर तक ले जाती हैं.
औद्योगिक नगरों के निकट प्रदूषित धाराएँ उसमें मिलती हैं.
वैज्ञानिक अध्ययन सतलुज घाटी को ऐसी जगह के रूप में देखते हैं जहाँ जलवायु, अपरदन और सक्रिय भूगर्भ एक-दूसरे को निरंतर प्रभावित करते हैं.
विचित्र ऐतिहासिक प्रतिध्वनि
यही कारण है कि सतलुज नाम की फ़िल्म का ग़ायब होना एक विचित्र ऐतिहासिक प्रतिध्वनि पैदा करता है.
सतलुज के पूरे जीवन में मनुष्य ने बार-बार उसे नाम देने, बाँटने और नियंत्रित करने की कोशिश की.
लेकिन सतलुज ने सभ्यता को बसते देखा और नदी-पाट को रेगिस्तान में बदलते देखा. उसने कारवाँ देखे, साम्राज्य देखे और सैनिकों को अपने पानी में डूबते देखा.
उसने विभाजन के शरणार्थी देखे, नहरों के बंद द्वार देखे, बाँधों का कंक्रीट देखा और खेतों में उगता वह अनाज देखा जिसने एक भूखे देश का भविष्य बदल दिया.
अब उसने अपने नाम की एक फ़िल्म को आते और फिर स्क्रीन से ग़ायब होते भी देखा है.
लेकिन किसी फ़िल्म को हटाने और किसी इतिहास को मिटाने के बीच वही अंतर है जो नदी पर बने बाँध और नदी की संपूर्ण यात्रा के बीच होता है.
बाँध कुछ समय तक पानी रोक सकता है; वह नदी के उद्गम, पुराने मार्गों, छोड़े हुए अवसादों और समुद्र तक पहुँचने की उसकी स्मृति को समाप्त नहीं कर सकता.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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