You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
होर्मुज़ स्ट्रेट पूरी तरह से बंद हो जाए तो क्या इन रास्तों से दुनिया का काम चल सकता है?
- Author, लुइस बारुचो
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
- प्रकाशित
- पढ़ने का समय: 11 मिनट
ईरान और अमेरिका के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ने के बाद दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ फिर सुर्ख़ियों में है.
स्थायी शांति के मक़सद से एक अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर करने के महज़ एक महीने बाद दोनों देशों के बीच फिर से हमले शुरू हो गए हैं. बढ़ते तनाव की वजह से तेल की क़ीमतों में भी उछाल आया है.
अगर स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से जहाज़ों का गुज़रना बहुत ज़्यादा ख़तरनाक हो जाए, तो क्या खाड़ी क्षेत्र के तेल और गैस निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच के लिए दूसरे रास्तों का इस्तेमाल कर सकते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि कुछ वैकल्पिक रास्ते मौजूद हैं, लेकिन फ़िलहाल उनमें से कोई भी इस अहम समुद्री मार्ग की जगह पूरी तरह नहीं ले सकता.
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ क्यों अहम है?
ईरान और ओमान के बीच स्थित स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ अब भी खाड़ी क्षेत्र के ज़्यादातर तेल और गैस के निर्यात का प्राथमिक रास्ता है. इसकी वजह है इस स्ट्रेट की बड़ी क्षमता, लचीलापन और कम लागत.
पाइपलाइन नेटवर्क की तुलना में तेल टैंकर कम लागत में ज़्यादा मात्रा में तेल और गैस पहुंचा सकते हैं. जबकि पाइपलाइन बनाने और उनके रखरखाव पर भारी निवेश करना पड़ता है.
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के मुताबिक़, हर दिन क़रीब दो करोड़ बैरल तेल और पेट्रोलियम उत्पाद स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से होकर गुज़रते हैं. यह दुनिया में समुद्री रास्ते से होने वाले कुल तेल व्यापार का लगभग एक चौथाई है. इनमें से लगभग 80 फ़ीसदी खेप एशिया भेजी जाती है. इसी समुद्री रास्ते से दुनिया के कुल लिक्वीफ़ाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) निर्यात का लगभग पांचवां हिस्सा भी गुज़रता है.
एलएनजी के मामले में इस स्ट्रेट पर निर्भरता और भी ज़्यादा है. दुनिया के सबसे बड़े एलएनजी निर्यातकों में शामिल क़तर अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक अपनी गैस पहुंचाने के लिए इसी रास्ते पर निर्भर है. फ़िलहाल क़तर के पास उसके एलएनजी निर्यात के लिए बड़े पैमाने पर कोई दूसरा विकल्प उपलब्ध नहीं है.
मौजूदा वैकल्पिक रास्ते
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाज़ार पर ईरान को मिलने वाले रणनीतिक प्रभाव को देखते हुए खाड़ी देशों ने लंबे समय से ऐसा इन्फ़्रास्ट्रक्चर विकसित करने में निवेश किया है, जिससे तेल का निर्यात इस समुद्री रास्ते पर निर्भर हुए बिना किया जा सके.
इनमें सबसे बड़ा निवेश सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन है, जिसे पेट्रोलाइन के नाम से भी जाना जाता है. लगभग 1,200 किलोमीटर लंबा यह नेटवर्क देश के ईस्टर्न ऑयल फ़ील्ड को लाल सागर तट पर स्थित यनबू निर्यात टर्मिनल से जोड़ता है.
इस पाइपलाइन का निर्माण 1980 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान किया गया था, जब दोनों देश खाड़ी क्षेत्र में तेल टैंकरों और अन्य व्यापारिक जहाज़ों को निशाना बना रहे थे. 2019 में इस पाइपलाइन की क्षमता बढ़ाकर आपात स्थिति में प्रतिदिन 70 लाख बैरल तक कर दी गई.
संयुक्त अरब अमीरात ने भी अपना वैकल्पिक मार्ग विकसित किया है. 406 किलोमीटर लंबी अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन (एडीसीओपी) अबू धाबी के हबशान तेल क्षेत्रों को ओमान की खाड़ी में स्थित फ़ुजैरह बंदरगाह से जोड़ती है. इससे तेल का निर्यात स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से गुज़रे बिना किया जा सकता है.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स ने इस मामले से जुड़े लोगों के हवाले से बताया कि दुबई स्थित बंदरगाह परिचालन कंपनी डीपी वर्ल्ड फ़ुजैरह में एक नया मल्टीपरपस पोर्ट विकसित करने के लिए बातचीत कर रही है. इसके साथ ही मौजूदा बंदरगाह पर एक नया टर्मिनल बनाने की भी योजना है. इन परियोजनाओं का मक़सद दुबई के प्रमुख हब जेबेल अली पर निर्भरता कम करना और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से बाहर मौजूद समुद्री मार्गों तक बेहतर पहुंच सुनिश्चित करना है.
हालांकि सबसे बड़ी सीमा इसकी क्षमता है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि इन वैकल्पिक रास्तों से प्रतिदिन केवल 35 लाख से 55 लाख बैरल तेल की आवाजाही हो सकती है, जबकि सामान्य तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से हर दिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल गुज़रता है.
लंदन के किंग्स कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया अध्ययन के एसोसिएट प्रोफ़ेसर डेविड बी. रॉबर्ट्स ने हाल के एक लेख में लिखा, "यह अब भी काफ़ी नहीं है."
रॉबर्ट्स का कहना है कि जहां वैकल्पिक रास्ते मौजूद भी हैं, वहां व्यावहारिक सीमाएं उनकी उपयोगिता कम कर देती हैं. उदाहरण के लिए, यनबू के लोडिंग टर्मिनलों को कभी भी 'इतनी तेज़ी से इतनी बड़ी मात्रा में' तेल संभालने के लिए तैयार नहीं किया गया.
इन दोनों मार्गों पर हमले भी हो चुके हैं. मार्च में यूएई ने ईरान पर फ़ुजैरह के ठिकानों पर हमला करने का आरोप लगाया था. इस हमले में स्टोरेज टैंक में आग लग गई थी और तेल लोडिंग का काम रोकना पड़ा था. अप्रैल में पेट्रोलाइन के एक पंपिंग स्टेशन पर इसी तरह के हमले के कारण प्रतिदिन सात लाख बैरल तेल की आपूर्ति प्रभावित हुई थी. पाइपलाइन का संचालन करने वाली सऊदी अरामको ने तीन दिनों के भीतर इसे फिर पूरी क्षमता से चालू कर दिया था.
ईरान ने भी स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ को बायपास करने के लिए अपना रास्ता तैयार किया है. लगभग 1,000 किलोमीटर लंबी यह पाइपलाइन खाड़ी क्षेत्र के उत्तरी हिस्से में स्थित गोरेह से ओमान की खाड़ी के जास्क निर्यात टर्मिनल तक जाती है. इसे प्रतिदिन 10 लाख बैरल तेल ढोने की क्षमता के साथ तैयार किया गया है, जिससे ईरानी तेल स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से गुज़रे बिना अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक पहुंच सकता है.
हालांकि, व्यवहारिक तौर पर प्रतिबंधों और टर्मिनल से जुड़ी अधूरी बुनियादी सुविधाओं की वजह से इस पाइपलाइन का इस्तेमाल उसकी तय क्षमता से काफ़ी कम हो पाया है.
भविष्य के एक्सपोर्ट रूट
स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर निर्भरता कम करने के लिए नए निर्यात मार्गों पर भी विचार किया जा रहा है.
इनमें एक विकल्प 970 किलोमीटर लंबी किरकुक-जेहान पाइपलाइन है, जो उत्तरी इराक़ के किरकुक क्षेत्र से तेल को भूमध्यसागर पर स्थित तुर्की के जेहान बंदरगाह तक पहुंचाती है.
ढाई साल तक बंद रहने के बाद यह पाइपलाइन सितंबर 2025 में फिर से शुरू हुई. मार्च 2026 तक इसके ज़रिए प्रतिदिन लगभग ढाई लाख बैरल तेल की आपूर्ति होने लगी. इससे इराक़ को तेल निर्यात का एक वैकल्पिक रास्ता मिला, हालांकि यह अब भी उसके कुल निर्यात की तुलना में काफ़ी छोटा है.
इराक़ हर दिन लगभग 34 लाख बैरल कच्चे तेल का निर्यात करता है. इनमें से लगभग 95 फ़ीसदी खेप दक्षिणी बंदरगाह बसरा से रवाना होती है और स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ से होकर गुज़रती है.
एक और संभावना किरकुक-बानियास पाइपलाइन को फिर से चालू करने की है. इसके ज़रिए इराक़ का तेल खाड़ी क्षेत्र से गुज़रे बिना सीरिया के भूमध्यसागर तट तक पहुंच सकता है.
क़रीब 800 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन का निर्माण 1952 में पूरा हुआ था, लेकिन ईरान-इराक़ युद्ध के दौरान इसे बंद कर दिया गया. हाल की मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, इराक़, सीरिया और अमेरिका ने क्षेत्रीय निर्यात मार्गों में विविधता लाने की व्यापक कोशिशों के तहत इसे फिर से बनाने पर चर्चा की है.
सबसे महत्वाकांक्षी प्रस्तावों में से एक 'फ़ोर सीज़ प्रोजेक्ट' है. यह एक प्रस्तावित ट्रांसपोर्ट और एनर्जी नेटवर्क है, जिसमें सीरिया और तुर्की के रास्ते भूमध्यसागर, काला सागर, कैस्पियन सागर और अरब की खाड़ी को आपस में जोड़ने की बात कही गई है.
अप्रैल 2026 में तुर्की के ऊर्जा मंत्री अल्पारस्लान बायरक्तार ने 2009 के उस लंबे समय से रुके प्रस्ताव को फिर से शुरू करने का सुझाव दिया, जिसके तहत अरब प्रायद्वीप के रास्ते क़तर और तुर्की को गैस पाइपलाइन से जोड़ने की योजना थी. इसे इस व्यापक पहल का हिस्सा माना जा सकता है.
इसके अलावा बसरा-अक़ाबा पाइपलाइन परियोजना को फिर से शुरू करने की मांग भी तेज़ हुई है. यह परियोजना पहली बार 1983 में प्रस्तावित की गई थी. इसके तहत इराक़ के तेल को जॉर्डन के लाल सागर तट पर स्थित अक़ाबा बंदरगाह तक पहुंचाने की योजना है. हालांकि राजनीतिक मतभेदों और वित्तीय चुनौतियों की वजह से इसका विकास बार-बार टलता रहा है.
इन परियोजनाओं के समर्थकों का कहना है कि इससे खाड़ी क्षेत्र में होने वाली रुकावटों का असर कम होगा और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर ईरान का प्रभाव भी घटेगा.
हालांकि सिंगापुर के एस. राजारत्नम स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ के वरिष्ठ विश्लेषक हुज़ैर एज़ेकिएल ज़ुलहिशाम ने हाल ही में प्रकाशित अपने एक शोध पत्र में चेतावनी दी है कि ये परियोजनाएं सिर्फ़ एक तरह की निर्भरता की जगह दूसरी तरह की निर्भरता पैदा कर सकती हैं.
उन्होंने लिखा, "इन मार्गों से ऊर्जा व्यापार पर उन देशों का नियंत्रण बढ़ जाएगा, जो ख़ुद ऊर्जा उत्पादक नहीं हैं, बल्कि ट्रांसपोर्ट के लिए केवल मार्ग उपलब्ध कराते हैं."
उन्होंने कहा कि इसका नतीजा यह हो सकता है कि तुर्की जैसे देशों का रणनीतिक प्रभाव और बढ़ जाए.
ज़ुलहिशाम के मुताबिक़, सुरक्षा भी एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी. इराक़ या सीरिया से होकर गुज़रने वाला कोई भी मार्ग क्षेत्रीय अस्थिरता, उग्रवादी संगठनों और एनर्जी इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमलों के जोखिम से पूरी तरह मुक्त नहीं होगा.
होर्मुज़ से परे
अगर खाड़ी के देश स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर अपनी निर्भरता कम भी कर दें, तब भी वे क्षेत्र में ऊर्जा परिवहन के वैकल्पिक मार्गों से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिमों से पूरी तरह नहीं बच पाएंगे.
इसका एक उदाहरण मिस्र की सुमेद पाइपलाइन है, जो रेड सी (लाल सागर) को भूमध्यसागर से जोड़ती है और स्वेज़ नहर को बायपास करते हुए यूरोप तक पहुंचने का एक रास्ता उपलब्ध कराती है. इस पाइपलाइन से प्रतिदिन 25 लाख से 28 लाख बैरल तेल भेजा जा सकता है.
हालांकि, हाल के महीनों में लाल सागर और बाब अल-मंदेब स्ट्रेट में हूती लड़ाकों की ओर से व्यापारिक जहाज़ों पर किए गए हमलों ने यह दिखाया है कि पूरे स्वेज़ कॉरिडोर की सुरक्षा अब भी एक बड़ी चुनौती है.
संघर्ष शुरू होने के बाद सुमेद पाइपलाइन से तेल की आवाजाही बढ़ी है, लेकिन रॉबर्ट्स का कहना है कि इसकी सीमित क्षमता अब भी "यूरोप की ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक बड़ी बाधा" बनी हुई है.
बुधवार को ईरान के रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स ने कहा कि जब तक अमेरिका अपनी "आक्रामक कार्रवाइयां" बंद नहीं करता, तब तक स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ बंद रहेगा. उन्होंने क्षेत्र के अन्य तेल और गैस निर्यात मार्गों को भी बाधित करने की धमकी दी.
क्या होर्मुज़ पर निर्भरता कम होगी?
ब्रिटेन के थिंक टैंक रॉयल यूनाइटेड सर्विसेज़ इंस्टीट्यूट (आरयूएसआई) में पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ डॉ. एच. ए. हेलियर का कहना है कि खाड़ी के देश अब स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए पहले से ज़्यादा प्रतिबद्ध हैं.
उन्होंने कहा, "खाड़ी के अरब देश भविष्य में स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर अपनी निर्भरता को जितना संभव हो सके, उतना कम करने की कोशिश करेंगे."
हेलियर का मानना है कि क्षेत्र की सरकारें आगे भी वैकल्पिक निर्यात मार्ग विकसित करती रहेंगी, क्योंकि वे अब पहले की तरह पूरी तरह स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर भरोसा नहीं कर सकतीं. हालांकि उनका यह भी कहना है कि ये वैकल्पिक रास्ते पूरी तरह होर्मुज़ की जगह नहीं ले पाएंगे.
उन्होंने कहा, "ऐसा नहीं होगा कि एक रास्ते की जगह पूरी तरह दूसरा रास्ता ले ले."
फिर भी हेलियर का मानना है कि जैसे-जैसे देश किसी एक क्षेत्रीय शक्ति पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशेंगे, स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ का रणनीतिक महत्व "बढ़ने के बजाय कम होता जाएगा."
उन्होंने कहा, "यह क्षेत्र इसराइल का दबदबा नहीं चाहता, लेकिन उसे ईरान का वर्चस्व भी मंज़ूर नहीं है."
हमने इस लेख का अनुवाद करने में एआई की मदद ली है, जिसे मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था. बीबीसी के एक पत्रकार ने प्रकाशन से पहले इस अनुवाद की जांच की. हम एआई का उपयोग कैसे कर रहे हैं, इसके बारे में और जानें.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.