होर्मुज़ पर अटका अमेरिका-ईरान समझौता; जंग या शांति, किस दिशा में बढ़ेंगे हालात?

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17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच जिस अस्थायी समझौते (एमओयू) ने कुछ समय के लिए तनाव कम होने की उम्मीद जगाई, वो अब गंभीर संकट में है.

अमेरिका का कहना है कि इस समझौते के बाद होर्मुज़ सबके लिए खुल गया है. जबकि ईरान का दावा है कि यह समझौता होर्मुज़ स्ट्रेट पर उसके अधिकार की स्वीकृति है. इसके बाद दोनों एक-दूसरे से जुड़ी जगहों पर हमले कर रहे हैं.

बीबीसी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में पूर्व भारतीय राजदूत नवदीप सूरी ने कहा कि "एमओयू को दोनों देश अपनी-अपनी तरह से परिभाषित कर रहे हैं. ऐसे में लगता है कि यह 'मेमोरेंडम ऑफ़ मिसअंडरस्टैंडिंग' बन चुका है. ये समझौता ज्ञापन जल्दबाज़ी में हुआ जिससे ये नहीं टिक सका."

पश्चिम एशिया मामलों के विशेषज्ञ अशरफ़ ज़ैदी का दावा है कि ईरानी जनता का एक वर्ग समझौते से ख़ुश नहीं है और यही भावना ईरानी प्रशासन के हालिया रुख़ में दिखती है कि वे ट्रंप से बदला चाहते हैं.

पूर्व राजदूत सूरी मानते हैं कि ईरान अब अपने आक्रमक रुख़ के चलते अपने समर्थक देशों का सपोर्ट खो सकता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग होर्मुज़ में अधिकार जमाने से ऊर्जा क़ीमतें फिर से बढ़ गई हैं, जिसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है.

इस कार्यक्रम में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने वॉशिंगटन में रह रहीं विदेश नीति में विशेषज्ञता रखने वाली वरिष्ठ पत्रकार सीमा सिरोही से भी बात की.

उन्होंने कहा कि अमेरिका के लिए अब युद्ध का मुख्य लक्ष्य होर्मुज़ को खुलवाना हो गया है और घरेलू स्तर पर युद्ध को लेकर कम समर्थन मिलने के चलते ट्रंप प्रशासन फिर से वार्ता की मेज पर लौटेगा. साथ ही बोलीं कि ईरान ने भी जवाबी ताक़त दिखाने के साथ कूटनीतिक रास्ता खुले होने का संकेत दिया है.

ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान ईरान का माहौल क्या बताता है?

विशेषज्ञ अशरफ़ ज़ैदी हाल में ईरान से लौटे हैं और उन्होंने कहा कि अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार से जुड़े आयोजनों के दौरान उन्होंने कई ईरानी लोगों में समझौता ज्ञापन (एमओयू) को लेकर बेचैनी देखी.

उनके मुताबिक़, "कई ईरानी लोग मानते हैं कि इस पूरे क्षेत्र की शांति का एकमात्र रास्ता अमेरिकी ठिकानों का ख़ात्मा है. ऐसे में वे मानते हैं कि "मौजूदा सरकार को समझौता न करके लड़ाई में आगे बढ़ना चाहिए था."

अशरफ़ ज़ैदी कहते हैं कि "वहां की कौम का एक वर्ग एक बड़ी जंग के लिए आमादा है, मैंने वहां चौराहों पर ट्रंप की हत्या की मांग के नारे सुने. ऐसा इसलिए है क्योंकि वे समझ गए हैं कि अमेरिका बग़ैर ताकत के हमारा पीछा छोड़ने वाला नहीं है.

कुछ लोग जंग से सहमत नहीं हैं मगर वे मानते हैं कि यह जंग अमेरिका ने उन पर थोपी है और वे नहीं लड़ेंगे तो देश पर बाहरी ताक़तों का कब्ज़ा हो जाएगा."

ज़ैदी कहते हैं कि सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई के लिखित बयान में भी अली ख़ामेनेई की मौत का बदला लेने की बात की गई जो वहां के राजनीतिक मूड को दर्शाती है.

ग़ौरतलब है कि बीबीसी मॉनिटरिंग ने भी ईरान में अली ख़ामेनेई के दौरान 'ट्रंप की हत्या' की मांग से जुड़े नारे और बैनर देखे.

पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी का कहना है कि ईरान में एक तबका मानता है कि जंग रुकनी चाहिए और अमेरिका के साथ जंग नहीं जीती जा सकती. मगर वहां के 'अतिवादी समूह' कहते हैं कि ऐसे देश से समझौता कैसे हो सकता है जिसने हमारे नेता की हत्या की हो.

वहीं, अशरफ़ ज़ैदी का यह भी कहना है कि ईरानी जनता अपने वर्तमान सर्वोच्च नेता मोजतबा ख़ामेनेई के सार्वजनिक रूप से सामने न आने को लेकर संतुष्ठ हैं और मानते हैं कि उनका महफ़ूज़ रहना मुल्क और जंग के लिए ज़रूरी है.

वे कहते हैं कि जिस तादाद में लोग अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार में जुटे, यह दिखाता है कि वर्तमान प्रशासन के आदेशों का जनता पालन कर रही है.

साथ ही वह कहते हैं कि "होर्मुज़ पर टोल लगाने या अधिकार करने जैसे ग़ैर-क़ानूनी काम करके ईरान उस सांत्वना को खो सकता है जो अब तक उसे दुनिया के कई देश देते रहे हैं. अब तक कई देशों की ईरान के साथ सांत्वना रही है कि छोटा देश होकर भी वह अमेरिका के साथ लड़ रहा है, मगर अब ये लड़ाई होर्मुज़ पर टिक गई है जो सबको असर कर रही है."

क्या जंग का लक्ष्य अब होर्मुज़ तक सिमट गया?

संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र और ऑस्ट्रेलिया में भारत के राजदूत रहे नवदीप सूरी ने हालिया तनाव की मूल वजह एमओयू की ख़ामियां हैं.

साथ ही, वे कहते हैं कि होर्मुज़ स्ट्रेट की वजह से ईरान के पास जो बढ़त थी वो अभी कायम है और अब जंग का फ़ोकस ईरान में सत्ता परिवर्तन और उसके परमाणु कार्यक्रम से बदलकर होर्मुज़ ब्लॉकेड पर शिफ़्ट होता दिख रहा है.

"आज के दिन हम अमेरिका के पहले बताए लक्ष्य तो भूल गए हैं कि न्यूक्लियर प्रोग्राम का क्या होगा और रिज़ीम चेंज तो हुआ नहीं. अब तो उनकी कोशिश है कि किसी तरह 28 फरवरी से पहले वाली होर्मुज़ की स्थिति पर पहुंचा जाए, जब जहाज़ आ-जा रहे थे और कोई टैक्स नहीं लग रहा था."

साथ ही वह कहते हैं कि ईरान के पास होर्मुज़ के चलते जो रणनीतिक बढ़त थी, वो अब भी क़ायम है.

वहीं, पत्रकार सीमा सिरोही ने कहा कि अब इस संघर्ष को लेकर अमेरिका का मुख्य लक्ष्य होर्मुज़ को खुलवाना है ताकि तेल के दाम कम हों क्योंकि ट्रंप की रेटिंग न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है और नवंबर में मध्यवर्ती चुनाव होने हैं.

साथ ही, वह कहती हैं कि अब ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़ा लक्ष्य अमेरिकी प्राथमिकता में नीचे आ गया है और इस पर बाद में सौदेबाज़ी होगी.

पूर्व राजदूत नवदीप सूरी और पत्रकार सीमा सिरोही मानती हैं कि एमओयू में कई शर्तें स्पष्ट नहीं हैं. सीमा कहती हैं कि एमओयू को बहुत सीमित समय में बनाया गया था.

सूरी ने कहा, "तब ट्रंप किसी तरह से डील चाहते थे इसलिए ये सब जल्दी में हुआ. इसके चलते ईरान ने एमओयू में भाषा अपने हिसाब से रखी और इसका लाभ उसे मिला. ईरान ने कहना शुरू किया कि वो जीत गया और अमेरिका ने भी जीत के दावे किए. मगर कोर इश्यू वहीं के वहीं हैं."

वे कहते हैं कि मुख्य विवाद होर्मुज़ स्ट्रेट से जुड़े प्रावधान (पैरा 5) पर है, जिसकी अमेरिका और ईरान अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं.

एमओयू पर अमेरिका कहता है कि ईरान इसे पूरी तरह खोलने पर राज़ी हो गया है. ईरान कहता है कि वह इसे अपने नियंत्रण और तय रूट के हिसाब से ही खोलेगा.

अब ईरान अपने दावे को लागू करने के लिए बिना उसकी अनुमति या समन्वय के गुज़रने वाले जहाजों पर कार्रवाई कर रहा है. ऐसे हमलों में कुछ भारतीय नागरिक भी प्रभावित हुए हैं.

उधर, अमेरिका इन हमलों को ग़ैर कानूनी बताकर ईरान पर हमले कर रहा है.

वे कहते हैं कि दोनों पक्ष अब भी चाहते हैं कि डील हो मगर लेकिन किन शर्तों पर होगी, वो अभी बहुत दूर है.

पत्रकार सिरोही कहती हैं कि ट्रंप के सलाहकार कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह दोनों बातचीत की टेबल पर लौटें, उधर ईरानी मुख्य सलाहकार ग़ालिबाफ़ ने भी बातचीत के संकेत दिए हैं.

ईरान जंग में भारत की कूटनीतिक रणनीति क्या सही है?

पूर्व राजनयिक नवदीप सूरी मानते हैं कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय कानून, नैतिकता और सिद्धांतों के पक्ष में भी मजबूत और स्पष्ट आवाज़ उठानी चाहिए. तभी उसका क़द बढ़ेगा और वो वहां तक जा सकेगा जहां जाने की उससे अपेक्षा की जाती है.

उन्होंने कहा कि अगर भारत, 28 फ़रवरी को ईरान के ऊपर हुए अमेरिकी हमले की निंदा करता तो शायद इस जंग का अब जो असर है या भविष्य में जो परिणाम होगा, उसमें भारत का कोई प्रभाव होता.

वे बोले, "इस बार इस जंग में हमने अगर एक साइड को चुना तो वह इसराइल और अमेरिका की साइड थी. 28 फ़रवरी को जब ईरान पर हमला किया गया तो हमें निंदा करनी चाहिए थी. हमने ऐसा नहीं किया और उससे शायद हमारी कुछ क्रेडिबिलिटी कम हुई."

वे आगे बोले, "हम डिप्लोमेटिक फ़ील्ड में इनएक्टिव थे या हमने क्योंकि एक साइड चुनी, इसके चलते ही शायद पाकिस्तान को भी बढ़त मिली और उसने इस मैदान में अपनी कूटनीतिक चाल खेली."

सूरी यह भी मानते हैं कि हाल में अली ख़ामेनेई के अंतिम संस्कार के लिए भारत ने जो प्रतिनिधिमंडल भेजा, वो कम से कम उपराष्ट्रपति स्तर का होना चाहिए था. हालांकि वे यह कहते हैं कि इसमें पीएम मोदी का शामिल होना मुश्किल था क्योंकि वे पहले से तय यात्राओं पर गए थे.

हालांकि सूरी यह मानते हैं कि भारत ने ऊर्जा संकट को अन्य देशों की तुलना में काफ़ी बेहतर तरीक़े से संभाला.

वे कहते हैं, "मैं डिप्लोमेसी को ऊर्जा के दृष्टिकोण से भी देखता हूं. हमने अपने जो संबंध बनाकर रखे थे, उसके कारण हमने जल्दी से अपने सोर्स डायवर्सिफ़ाई किए और ऊर्जा संकट की स्थिति को मैच्योरिटी से संभाला. लेकिन हमें अपने रणनीतिक पेट्रोलियम को दोगुना या तिगुना करना पड़ेगा."

पूर्व राजनयिक सूरी ने महंगाई के मुद्दे पर कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में यह सरकार के हाथ में नहीं है. उनका कहना है कि काफ़ी समय तक सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने इस बोझ को उठाया और फिर ईंधन के दाम बढ़ाए गए. अगर ऐसा न किया जाता तो कंपनियां डूब सकती थीं.

साथ ही, मर्चेंट नेवी में भारतीयों की सुरक्षा के सवाल पर भी भारत सरकार के रुख़ से सूरी सहमत हैं. वे कहते हैं कि सरकार सिर्फ़ एडवाइज़री जारी कर सकती है कि सेलर ऐसे जहाज़ों पर न जाएं जो संघर्ष क्षेत्र से गुज़रते हों. मगर ये कंपनियों के ऊपर निर्भर करता है.

पत्रकार सीमा सिरोही कहती हैं कि इस युद्ध से भारत के हित बड़े स्तर पर जुड़े हैं. क्षेत्रीय समुद्री व्यापार में बड़ी संख्या में भारतीय नाविक और कर्मचारी कार्यरत हैं. साथ ही भारत की ऊर्जा सुरक्षा भी खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता पर निर्भर करती है. इसलिए भारत को अधिक सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाने की आवश्यकता है.

वह कहती हैं, "भारत को कोई मजबूत कदम उठाना चाहिए, कूटनीति में अपनी जगह बनानी चाहिए. कम से कम यह तो कहना चाहिए कि जो हो रहा है, वो गलत है. पर ऐसा लगता है कि दिल्ली एकदम चुपचाप बैठी है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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