बांग्लादेश: बीएनपी और जमात, दोनों गठबंधनों के सामने कौन सी मुसीबत खड़ी हो गई?

बांग्लादेश
इमेज कैप्शन, संसदीय चुनाव से पहले दोनों बड़े गठबंधन में सीटों के बंटवारे समेत विभिन्न मुद्दों पर खींचतान चल रही है
    • Author, तफ़सीर बाबू
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज बांग्ला
  • प्रकाशित
  • पढ़ने का समय: 8 मिनट

बांग्लादेश में अगले महीने होने वाले संसदीय चुनाव के लिए दो गठबंधन सबसे ज़्यादा सक्रिय नज़र आ रहे हैं.

इनमें से एक गठबंधन का नेतृत्व बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) कर रही है. इसमें मुख्य तौर पर अतीत में साथ मिलकर आंदोलन करने वाली जन अधिकार परिषद और गणतंत्र मंच में शामिल राजनीतिक पार्टियों के साथ सीटों पर समझौता किया गया है.

दूसरे गठबंधन में जमात-ए-इस्लामी, इस्लामी आंदोलन और नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) समेत 11 राजनीतिक दल शामिल हैं.

कहा जा रहा है कि इस बार चुनाव में इन दोनों गठबंधनों के बीच ही मुख्य मुक़ाबला होगा.

बीएनपी और जमात अपने गठबंधन में शामिल राजनीतिक दलों के साथ सीटों के बँटवारे पर बातचीत कर रही हैं. लेकिन इस दौरान उनमें धीरे-धीरे मतभेद, संदेह और अविश्वास उभरने लगा है.

सीटों के बँटवारे पर विवाद और इसकी वजह से कुछ स्थानीय नेताओं की बग़ावत के कारण भी संकट पैदा हो गया है.

सीटों के बँटवारे के सवाल पर ही जमात और इस्लामी आंदोलन के बीच टकराव बढ़ रहा है.

दूसरी ओर, बीएनपी गठबंधन में बाग़ी उम्मीदवार समस्या बढ़ा रहे हैं. समझौते के तहत दूसरी पार्टी को दी गई सीटों पर बाग़ी नेता निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतर गए हैं.

इस्लामी आंदोलन और जमात के बीच एक सीट पर खींचतान

बरिशाल सदर इस्लामी आंदोलन का मूल केंद्र रहा है. इसके तहत चारमोनाई यूनियन सीट से इस्लामी आंदोलन के वरिष्ठ नायब अमीर सैयद मोहम्मद फ़ैज़ुल करीम मैदान में हैं.

लेकिन जमात-ए-इस्लामी के केंद्रीय सहायक सचिव जनरल मुअज्जम हुसैन हेलाल ने भी इसी सीट से नामांकन पत्र दाख़िल कर दिया है.

अब स्थिति यह है कि एक ही गठबंधन में रहने के बावजूद दोनों में से कोई भी अपनी सीट छोड़ने के लिए तैयार नहीं है. इससे दोनों दलों में टकराव बढ़ रहा है.

अपने केंद्र में जमात के उम्मीदवार का मैदान में उतरना इस्लामी आंदोलन को नागवार गुज़रा है.

इस्लामी आंदोलन के वरिष्ठ नायब-ए-अमीर और बरिशाल-5 सीट पर पार्टी के उम्मीदवार सैयद मोहम्मद फ़ैज़ुल करीम बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "हमने तो जमात के अमीर डॉ. शफ़ीक़ साहब की सीट पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है. ऐसे में उनका यहां उम्मीदवार खड़ा करना उचित नहीं है. इस इलाक़े में हमारा जनाधार है. क्या लोग यहां गठबंधन को वोट देंगे? क्या ऐसा करना उचित है?"

पटुआखाली-3 सीट पर बीएनपी के बागी उम्मीदवार हसन मामून
इमेज कैप्शन, पटुआखाली-3 सीट पर बीएनपी के बागी उम्मीदवार हसन मामून

इस सीट के सवाल पर इस्लामी आंदोलन के साथ दूरियां बढ़ने के बावजूद जमात इस सीट को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है.

उसकी दलील है कि इस्लामी आंदोलन के सैयद मोहम्मद फ़ैज़ुल करीम बरिशाल-5 के साथ ही बरिशाल-6 सीट पर भी चुनाव लड़ रहे हैं. जमात ने उनसे दोनों सीटों की बजाय सिर्फ़ बरिशाल-6 सीट पर ही चुनाव लड़ने को कहा है.

जमात के केंद्रीय सहायक सचिव जनरल मुअज्जम हुसैन हेलाल कहते हैं, "वो (सैयद मोहम्मद करीम) दो सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं. हमने उनसे सिर्फ़ बरिशाल-6 की एक सीट लेने को कहा है. लेकिन उन्होंने दोनों सीटों पर नामांकन पत्र दायर कर दिया है. जमात के अमीर भी एक साथ दो सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. उम्मीद है बातचीत के ज़रिए यह समस्या सुलझ जाएगी."

'बीएनपी के 90 प्रतिशत लोग बागी उम्मीदवारों के साथ हैं'

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जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन में खींचतान चल ही रही है. लेकिन बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन में भी सब-कुछ ठीक नहीं चल रहा है. मिसाल के तौर पर बरिशाल से सटे पतुआखाली ज़िले का ज़िक्र किया जा सकता है.

इस ज़िले में गलाचिपा और दशमीना को लेकर गठित पतुआखाली-3 सीट पर बीएनपी का कोई अधिकृत उम्मीदवार मैदान में नहीं है. समझौते के तहत यह सीट गठबंधन के घटक दल जन अधिकार परिषद के अध्यक्ष नुरुल हक़ नूर को दी गई है.

लेकिन गठबंधन की ओर से नामांकन दायर करने के बावजूद उनको इलाक़े में बीएनपी का समर्थन नहीं मिल रहा है.

उन्होंने बीबीसी बांग्ला से कहा, "इलाक़े में बीएनपी के नब्बे फ़ीसदी नेता और कार्यकर्ता बाग़ी उम्मीदवार के पक्ष में काम कर रहे हैं."

इस सीट पर बीएनपी की केंद्रीय समिति के सदस्य रहे हसन मामून बाग़ी उम्मीदवार के तौर पर मैदान में हैं. हालांकि हाल में उनको पार्टी से निकाल दिया गया है.

पार्टी की ओर से टिकट नहीं मिलने के कारण उन्होंने निर्दलीय के तौर पर चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है.

हाल में गलाचिपा में हसन मामून की ओर से आयोजित एक घरेलू बैठक में बीएनपी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी ही ज़्यादा थी. उनमें उपज़िले के बीएनपी नेताओं के अलावा छात्र दल के पदाधिकारी भी शामिल थे.

इस बारे में पूछने पर मामून का कहना था कि वो बीएनपी को बचाने के लिए ही चुनाव लड़ रहे हैं.

हसन मामून बीबीसी बांग्ला से कहते हैं, "राजनीतिक नेतृत्व तय करने में ग़लती होने की स्थिति में आम लोगों के बीच से ही नेतृत्व उभरता है. यह सीट गठबंधन के घटक दल को देने के बाद स्थानीय नेतृत्व को महसूस हुआ कि यहां से बीएनपी को उम्मीदवार उतारना चाहिए था. बीएनपी के तमाम स्थानीय नेता और कार्यकर्ता मेरे साथ हैं. वो लोग जानते हैं कि अगर यह सीट हमने जन अधिकार परिषद के लिए छोड़ दी तो बीएनपी अगले 30 साल तक यहां नहीं जीत सकेगी."

बीएनपी का अधिकृत उम्मीदवार नहीं होने के बावजूद इलाक़े में हसन मामून ही असली उम्मीदवार लग रहे हैं. पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता उनके लिए काम कर रहे हैं. इससे जन अधिकार परिषद के उम्मीदवार के मन में इस सीट पर बीएनपी की भूमिका को लेकर संदेह पैदा हो गया है.

इसके साथ ही घटक दलों को मिली दूसरी सीटों पर भी बाग़ी उम्मीदवारों के मैदान में रहने की वजह से पूरा गठबंधन ही अविश्वास की स्थिति से जूझ रहा है.

जन अधिकार परिषद के अध्यक्ष नुरुल हक़ नूर ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "हमें उम्मीद थी कि संसद में संतुलन बनाए रखने के लिए बीएनपी घटक दलों के लिए 40 से 50 सीटें छोड़ देगी. लेकिन पार्टी ने बहुत कम सीटें छोड़ी हैं. इससे उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं में इन सीटों पर भी चुनाव लड़ने की प्रवृत्ति बढ़ रही है. ऐसा सिर्फ़ हमारी पार्टी ही नहीं, दूसरे घटक दलों के साथ भी हो रहा है."

जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेताओं की प्रेस कांफ्रेंस
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समाधान की उम्मीद

बीएनपी ने अब तक गठबंधन के घटक दलों के लिए 12 सीटें छोड़ी हैं.

इनके अलावा बाक़ी जिन सीटों पर समझौते की बात चल रही है, वहां भी बाग़ी उम्मीदवार मैदान में हैं. इससे घटक दलों में नाराज़गी बढ़ रही है.

बीएनपी ने हालांकि बाग़ी उम्मीदवारों को पार्टी से निकाल दिया है. लेकिन घटक दल इससे संतुष्ट नहीं हैं.

इसकी वजह पहले भी निकालने के बावजूद बाद में ऐसे नेताओं को दोबारा पार्टी में शामिल किया जाता रहा है. ख़ासकर चुनाव जीतने के बाद उनको पार्टी में लौटने में ज़्यादा समय नहीं लगता.

इसी वजह से घटक दलों को आशंका है कि बाग़ी उम्मीदवारों को मैदान से नहीं हटाने की स्थिति में उनके उम्मीदवारों का चुनाव जीतना मुश्किल हो जाएगा.

इसके अलावा घटक दलों के उम्मीदवारों को बीएनपी के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं का समर्थन नहीं मिलेगा.

इस बारे में पूछे गए एक सवाल पर बीएनपी की स्थायी समिति के सदस्य इक़बाल हसन महमूद टुकू का कहना था कि इस बात की कोशिश की जा रही है कि किसी सीट पर बाग़ी उम्मीदवार न रहें.

वो कहते हैं, "पार्टी नेतृत्व की उपेक्षा कर मैदान में उतरने वाले नेताओं के ख़िलाफ़ सांगठनिक कार्रवाई की गई है. अब अगर कोई चाहे तो इस पर संदेह कर ही सकता है. घटक दल जानते हैं कि हमारे कार्यवाहक अध्यक्ष तक ने बाग़ी उम्मीदवारों से बात की है. अब भी नाम वापस लेने के लिए समय बचा है."

बीएनपी के मुताबिक़ वो इस समस्या के समाधान का प्रयास कर रही है.

लेकिन उसके ख़िलाफ़ मैदान में उतरने वाले जमात के नेतृत्व वाले गठबंधन के 11 दलों के बीच अब तक सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप ही नहीं दिया जा सका है. इसकी वजह से इस गठबंधन में अस्थिरता का माहौल पैदा हो गया है. मुख्य रूप से इस्लामी आंदोलन और जमात ही इस विवाद की जड़ में हैं.

इन दोनों दलों के क़रीब पौने तीन सौ उम्मीदवारों ने नामांकन पत्र भी दायर कर दिया है. इससे गठबंधन के भविष्य पर सवाल उठ रहे हैं.

इस्लामी आंदोलन के वरिष्ठ नायब अमीर सैयद मोहम्मद फैजुल
इमेज कैप्शन, इस्लामी आंदोलन के वरिष्ठ नायब अमीर सैयद मोहम्मद फैजुल

इस्लामी आंदोलन के वरिष्ठ नायब अमीर सैयद मोहम्मद फ़ैज़ुल करीम कहते हैं, "हमें 100 के आसपास सीटें मिलने की उम्मीद है. इससे कम पर कोई सम्मानजनक समझौता नहीं हो सकता."

लेकिन सीटों के बँटवारे पर होने वाले समझौते में अगर 100 से काफ़ी कम सीटें मिलीं तो क्या गठबंधन बना रहेगा?

इस पर करीम कहते हैं, "आख़िर हमें 100 सीटें क्यों नहीं दी जा सकतीं? क्या इसका कोई ठोस आधार है?"

उनका कहना था कि अगर किसी की आपत्ति की वजह से ऐसा नहीं हुआ तो आगे की ज़िम्मेदारी भी उसी के कंधों पर होगी.

अब यह बात साफ़ हो गई है कि अगर जमात समेत 11 दलों के गठबंधन में सीटों के बँटवारे को लेकर पैदा होने वाली जटिलताओं को दूर नहीं किया गया तो गठबंधन टूट भी सकता है.

इसके उलट बीएनपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के टूटने का तो कोई ख़तरा नहीं है. लेकिन बीएनपी के ज़मीनी स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं के समर्थन के सवाल पर घटक दलों के बीच संदेह और अविश्वास ज़रूर पैदा हो गया है.

अब चुनाव से पहले दोनों गठबंधनों का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि ये दोनों घटक दलों के साथ पैदा होने वाली दूरी को कैसे पाटते हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.