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गर्भवती औरतों की जान ये 'मिडवाइफ़'
- Author, खुशबू दुआ
- पदनाम, मुंबई से बीबीसी हिदी डॉट कॉम के लिए
- प्रकाशित
यूनाइटेड नेशन्स चिल्ड्रन्स फंड (यूनिसेफ़) के मुताबिक़ दुनिया भर में हर दिन करीब 800 महिलाओं की गर्भावस्था और प्रसव से मौत होती है.
इनमें से 20 फ़ीसदी महिलाएं भारत की होती हैं.
गर्भ और प्रसव के दौरान महिलाओं की मृत्यु न हो, इसलिए मुंबई में 'मुंबई मिडवाइफ़' नाम की एक खास कंपनी शुरू की गई है.
'मुंबई मिडवाइफ़' की शुरुआत इंग्लैंड से फार्मासिस्ट की ट्रेनिंग ले चुकी कैथरीन ने की है.
कैथरीन ने बीबीसी को अपना अनुभव बताया.
कुछ साल पहले कैथरीन और उनकी साथी लाइना उत्तर भारत के मसूरी में रहकर हिंदी सीख रही थीं. हिंदी टीचर की बेटी उन दिनों वहां अपनी पहली डिलीवरी के लिए आई हुई थी.
लाइना अमरीका की प्रशिक्षित मिडवाइफ यानी नर्स हैं. लाइना ने उनकी गर्भवती बेटी को कुछ व्यायाम बताए. इससे उन्हें डिलीवरी में काफ़ी सहूलियत हुई. उनकी डिलीवरी नॉर्मल रही और उन्होंने एक बेटी को जन्म दिया.
कैथरीन ने बताया, "इन सबसे हिंदी टीचर इतनी प्रभावित हुई कि उन्होंने ही यह सुझाव दिया कि मैं और लाइना मिलकर मिडवाइफ़ सेवा देने वाली एक संस्था शुरू करें."
मुंबई आकर कैथरीन और लाइना ने मिल कर मिडवाइफ़ सेवा की शुरुआत की.
मिडवाइफ़ को भारत में दाई या नर्स कहा जाता है. नर्स बनने के लिए विदेशों में तीन साल का कोर्स होता है, लेकिन भारत में यह कम अवधि का कोर्स है.
दौला की कोई मेडिकल पृष्ठभूमि नहीं है. यह सिर्फ़ गर्भावस्था में महिलाओं की मदद और उन्हें आराम देने के लिए बनाई गई एक महिला है, जो ज़रूरत पड़ने पर कुछ ज़रूरी फ़ैसले भी लेती है.
भारत में जिन घरों में गर्भावस्था के दौरान किसी बड़े बुजुर्ग का साथ नहीं मिल पााता, वहां दौला को बुलाया जाता है.
कैथरीन ने कहा, "गर्भवती महिलाओं को मेरी संस्था पांच तरह की सेवाएं देती है. इसमें बच्चे का घर पर जन्म, पानी में जन्म, मिडवाइफ़ की मदद, दौला की मदद और प्रसव के दौरान व्यायाम शामिल है."
उनकी संस्था पूरी प्रक्रिया डॉक्टर और अस्पताल के साथ मिलकर करती हैं, ताकि बीच में कोई समस्या आए तो तुरंत डॉक्टर को बुलाया जा सके.
मिडवाइफ़ की मदद से घर पर पानी में बच्चे को जन्म देने वाली अलोका ने बीबीसी को बताया, "मेरा पहला बच्चा अस्पताल में डॉक्टर की मदद से हुआ. उस दौरान डॉक्टर ने कुछ ऐसी दवाइयां दे दी, जिनकी ज़रूरत नहीं थी. उन दवाइयों के कारण मुझे 37 हफ़्ते बाद ही प्रसव पीड़ा होने लगी. बच्चा तो नार्मल हुआ, लेकिन उस वक़्त तक बच्चा बाहर आने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं था."
अलोका आगे कहती हैं, "असल में डॉक्टर को तब एक सेमीनार में जाना था और वो मेरी डिलीवरी को अपने शैड्यूल के हिसाब से करना चाहते थे. इसलिए उन्होंने मुझे वो दवाइयां दीं. बच्चा तो नार्मल हुआ, लेकिन मुझे नॉर्मल दर्द उठने पर डिलीवरी होती तो ज़्यादा अच्छा रहता."
वे कहती हैं, "यह गर्भवती महिलाओं पर निर्भर होता है कि वह किस तरह की सेवाएं चाहती हैं."
शहर की अधिकतर महिलाएं घर या पानी में बच्चे को जन्म देना पसंद करती हैं. उनका मानना है कि घर में बच्चे की डिलीवरी में कोई डर नहीं होता है. अस्पताल में ज़्यादा मरीजों के कारण बच्चे को इंफेक्शन का खतरा बना रहता है.
ब्रिटेन की लाइना अमरीका से मिडवाइफ़ का कोर्स कर मुंबई में मिडवाइफ़ के तौर पर काम कर रही हैं. काफ़ी दिनों तक फ़िलीपीन्स में काम करने के बाद लाइना साल 2007 में भारत आई.
लाइना के मुताबिक, "इंग्लैंड में मिडवाइफ की सेवाएं मुफ़्त हैं और वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाईजेशन (डब्ल्यूएचओ) भी इसमें मदद करता है.
वे कहती हैं, "मेरे पास भारतीय नागरिकता नहीं है. इसलिए मैं भारतीय डॉक्टर के साथ मिलकर मिडवाइफ़ का काम करती हूं. मुझे भारत में काम करने की अनुमति तो है, लेकिन सरकार के साथ पंजीकरण नहीं हैं."
अपनी दूसरी डिलीवरी के लिए अलोका ने तीसरे महीने में ही लाइना और उनकी साथी से संपर्क किया. वे जांच और दवाओं के लिए एक डॉक्टर के संपर्क में भी थी.
लेकिन डिलीवरी के दौरान मिडवाइफ़ उनके पास थीं. जहां तक खर्च की बात है तो कुल मिलकर दोनों खर्च लगभग समान ही था. वे मिडवाइफ़ के साथ अपने अनुभव को बहुत ही सुखद मानती हैं.
लाइना के मुताबिक, उनके पास 50 से 60 प्रतिशत ग्राहक भारतीय हैं, जबकि 40 प्रतिशत अंतरराष्ट्रीय. अगर उनकी सर्विस से किसी को कोई परेशानी होती है तो वे इसकी शिकायत डॉक्टर से कर सकते हैं. क्योंकि उनकी संस्था डॉक्टर के साथ मिलकर ही यह काम करती हैं.
इसके अलावा 'बर्थ इंडिया' में भी इसकी शिकायत की जा सकती है. बर्थ इंडिया एक ग़ैर सरकारी संस्था है, जिसके साथ मुंबई की मिडवाइफ़ जुडी हुई हैं.
लाइना बताती हैं, "अगर भारत में ज़्यादा से ज़्यादा मिडवाइफ़ होंगी तो सरकार का पैसा और महिलाओं की जान बचाने में आसानी होगी. कई साल से भारत में बच्चे पैदा करने के लिए दाई की मदद ली जाती है. बस इसे बढ़ावा देने की जरूरत है."
उनके मुताबिक़, अगर भारत में भी अच्छा प्रशिक्षण दिया जाए तो छोटे-छोटे गांवों में गर्भवस्था के दौरान महिलाओं की मृत्यु होने का डर कम होगा. मिडवाइफ़ गर्भवती महिलाओं को सही जानकारी देकर उनकी हर समस्या को दूर कर सकती हैं.
आलोका ने बताया कि मिडवाइफ़ ने उनका ख़्याल बिलकुल मां की तरह रखा. मिडवाइफ के लिए गर्भवती महिला पहले है और वो हर वक़्त उनके आस-पास मौजूद रहती हैं. अस्पताल में डॉक्टर के मुताबिक मरीजों को ख़ुद को ढालना पड़ता है."
मिडवाइफ़ के बारे में डॉक्टर भी यही मानते हैं कि गर्भ के दौरान महिलाओं को मानसिक रूप से स्थिर रखना ज़रूरी होता है. यह काम एक मिडवाइफ़ बेहतर तरीके से कर सकती है.
मुंबई लीलावती हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर के प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की प्रमुख डॉ.किरण कोएलो का मानना है कि गर्भवती महिला अक्सर मिडवाइफ के साथ ज़्यादा सुरक्षित और सुकून महसूस करती है, क्योंकि वो उसके साथ ज़्यादा वक़्त बिताती हैं.
मिडवाइफ का सबसे जरूरी काम है कि वो घर पर नार्मल डिलीवरी करवाए और ज़रूरत पड़ने पर डॉक्टर को बुलाए या गर्भवती महिला को अस्पताल भेजे.
डॉ. किरण ने कहा, "भारत में सहायक नर्स या मिडवाइफ की ट्रेनिंग केवल 3 से 6 महीने की होती है, जबकि बीएससी नर्स की ट्रेनिंग 3 साल की होती है. अब मिडवाइफ की ट्रेनिंग भी 3 साल की कर दी जाए, ताकि भारत में भी बेहतर और ज़्यादा कुशल मिडवाइफ हो."
डॉ. कोएलो के मुताबिक़, शहरों में ज़्यादातर डिलीवरी तो डॉक्टर ही करते हैं. लेकिन ग्रामीण क्षेत्र में दाई की ज़्यादा जरूरत होती है क्योंकि वहां आज भी अच्छे डॉक्टर और मेडिकल सुविधाओं की कमी है.
उन्होंने आगे कहा, "शहरों में अब काफी लोग मिडवाइफ़ के पास जाने लगे हैं. पर ज़्यादा ज़रूरी ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी ट्रेनिंग देकर मिडवाइफ़ तैयार की जाएं. अगर इस सुविधा को और बढ़ावा दिया जाए तो ग्रामीण क्षेत्र में कई लोगों की जान बच सकती हैं."