विदेशी मीडिया सीजेपी के संसद मार्च में जुटी भारी भीड़ को किस संकेत के रूप में देख रहा है?

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नरेंद्र मोदी सरकार के ख़िलाफ़ लंबे समय बाद सोमवार को इस पैमाने पर युवाओं का ग़ुस्सा सड़कों पर दिखा.
हज़ारों की संख्या में सड़कों पर उतरे युवा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर संसद की तरफ़ मार्च कर रहे थे.
पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं. दर्जनों की संख्या में प्रदर्शनकारी ज़ख़्मी भी हुए हैं.
प्रदर्शन कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का था लेकिन इसमें वैसे लोग भी शामिल हुए जो सरकार की नीतियों से नाराज़ थे. इस विरोध प्रदर्शन की कवरेज अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी बड़े पैमाने पर की गई है.
अमेरिकी मीडिया आउटलेट ब्लूमबर्ग ने लिखा है कि आंदोलन के सबसे प्रमुख समर्थक, 59 वर्षीय सोनम वांगचुक, को प्रदर्शन स्थल से बलपूर्वक हटाए जाने से लोगों की नाराज़गी और बढ़ गई. सोमवार दोपहर तक संसद परिसर की ओर जाने वाली कई प्रमुख सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ जमा हो गई.
प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने कई जगहों पर आंसू गैस के गोले छोड़े. दोपहर में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के एक प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से मुलाक़ात कर प्रदर्शनकारियों की मांगें औपचारिक रूप से सौंपीं. हालांकि अभी आंदोलन जारी है.
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''हालांकि सीजेपी के नेताओं ने अपनी मुख्य मांग, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े पर ज़ोर बनाए रखा, लेकिन सड़कों पर मौजूद प्रदर्शनकारियों का ग़ुस्सा सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर भी दिखाई दिया, जो सरकार के प्रति व्यापक असंतोष को दर्शाता है. दिल्ली में बार-बार एक नारा सुनाई दे रहा था, "जब-जब मोदी डरता है, पुलिस के पीछे छिपता है."
संसद के भीतर विपक्षी दलों ने दोनों सदनों की कार्यवाही स्थगित होने से पहले इन प्रदर्शनों पर चर्चा की मांग की. छात्र आंदोलन से अब तक दूरी बनाए रखने वाले कई वरिष्ठ विपक्षी नेताओं ने भी प्रदर्शनकारियों की मांगों का समर्थन किया. 25 दिनों तक चलने वाले मॉनसून सत्र के दौरान विपक्ष सरकार को महंगाई, बेरोज़गारी और राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी पर घेरने की तैयारी में है.

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मज़बूत सरकार के ख़िलाफ़ मज़बूत विरोध प्रदर्शन
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''अगले चार सप्ताह में एक बड़ा राजनीतिक विवाद परिसीमन बिल को लेकर भी हो सकता है. यह बिल लोकसभा की 543 निर्वाचन सीटों को बढ़ाकर 850 करने और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करने का प्रस्ताव रखता है. हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में सबसे बड़े संवैधानिक बदलावों में से एक माने जा रहे इस बिल को अप्रैल में संविधान संशोधन के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका था.''
ब्लूमबर्ग ने लिखा है, ''हालिया विधानसभा चुनावों में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष अपनी राजनीतिक स्थिति और मज़बूत की है, जिससे 75 वर्षीय नेता के लिए अगले दशक तक भारत की सत्ता में बने रहने की संभावना प्रबल हुई है. इसके बावजूद, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के विरोध प्रदर्शन बढ़ते जन असंतोष का संकेत दे रहे हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के लिए आगामी चुनावों में चुनौती बन सकता है. इनमें उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भी शामिल है, जो भारत का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और जहाँ अगले वर्ष मई तक मतदान होना है.''
अमेरिकी अख़बार न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में भारत जैसे पारंपरिक रूप से जीवंत लोकतंत्र में विरोध-प्रदर्शन और असहमति के लिए उपलब्ध जगह काफ़ी सीमित हुई है. उनकी सरकार पर असहमति की आवाज़ों पर कार्रवाई करने और कई एक्टिविस्ट को जेल भेजने के आरोप लगते रहे हैं. इससे सार्वजनिक विरोध पर एक तरह का भय का माहौल बना है.''
न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है, ''मौजूदा आंदोलन की शुरुआत कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने की, जो सिर्फ़ दो महीने पहले बना एक ज़मीनी आंदोलन है और अब भारत के युवाओं के ग़ुस्से का प्रतीक बन गया है. इसकी शुरुआत भारत के चीफ़ जस्टिस की उस टिप्पणी के बाद हुई, जिसमें उन्होंने बेरोज़गार युवाओं की तुलना कॉकरोच और परजीवियों से की थी. जून में इस संगठन ने प्रश्नपत्र लीक मामलों में जवाबदेही तय करने की मांग को लेकर धरना शुरू किया.''
न्यूयॉर्क टाइम्स से 26 वर्षीय रिसर्चर प्रियम दुबे ने बताया,, ''2024 में जब वह पढ़ाई कर रहे थे, तब भी परीक्षा प्रश्नपत्र लीक हुआ था. उन्होंने एक ऐसी प्रवेश परीक्षा दी थी, जिसके ज़रिए उन्हें स्कॉलरशिप मिल सकती थी और मास्टर की पढ़ाई का ख़र्च निकल सकता था. लेकिन बाद में उन्हें बताया गया कि परीक्षा रद्द कर दी गई है और उन्हें दोबारा परीक्षा देनी होगी.''
उन्होंने कहा, "मैंने परीक्षा दी थी, वह बहुत अच्छी गई थी. लेकिन अगली सुबह जब मैं उठा, तो पता चला कि प्रश्नपत्र लीक हो गया है और परीक्षा रद्द कर दी गई है. मैं फिर से तैयारी नहीं करना चाहता था."
उनका कहना था कि उनके जैसे युवाओं को जिन कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है, उसके लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं होती. जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, प्रदर्शन स्थल के आसपास इंटरनेट सेवा भी बंद हो गई.
'गहरे असंतोष का संकेत?'

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ब्रिटिश अख़बार फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, ''सीजेपी के आह्वान पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी सोमवार सुबह से ही पैदल संसद की ओर बढ़ने लगे. उनके हाथों में झंडे और तख्तियां थीं, जिन पर सरकार से "जागो और हमारी बात सुनो" जैसी मांगें लिखी थीं. दोपहर में तनाव बढ़ गया, जब सुरक्षा बलों ने संसद जाने वाले रास्तों पर प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े. इसके जवाब में प्रदर्शनकारियों ने नारे लगाए, "जब-जब मोदी डरता है, पुलिस को आगे करता है."
फ़ाइनैंशियल टाइम्स ने लिखा है, ''मथुरा से प्रदर्शन में शामिल होने आए कपड़ा कारोबारी मयंक सूरी ने कहा- मैं छात्रों के समर्थन में आया हूँ क्योंकि इस सरकार को लगता है कि वह जो चाहे कर सकती है. हम सिर्फ़ संसद के एंट्री गेट तक जाना चाहते हैं ताकि सांसदों तक अपनी मांगें पहुंचा सकें. जब तक सरकार कार्रवाई नहीं करती, हम प्रदर्शन जारी रखेंगे."
ब्रिटिश अख़बार ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा है, ''बीजेपी ने पिछले दो वर्षों में कई राज्यों के चुनाव जीते हैं, जिससे भारतीय राजनीति में उसका वर्चस्व और मज़बूत हुआ है. ऐसा प्रभुत्व 1980 के दशक की शुरुआत में इंदिरा गांधी के दौर के बाद पहली बार देखने को मिला है. हालांकि परीक्षा व्यवस्था को लेकर पैदा हुआ विवाद जनता के भीतर गहरे असंतोष को सामने लेकर आया है.''
ब्रिटेन के एक और अख़बार द गार्डियन ने सोमवार को दिल्ली के विरोध प्रदर्शन के बारे में लिखा है, ''नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों में हाल के वर्षों में युवा-नेतृत्व वाले आंदोलनों ने सरकारों को सत्ता से बाहर कर दिया है. इसके उलट, भारत में इतने बड़े पैमाने पर असहमति का सार्वजनिक प्रदर्शन हाल के वर्षों में अपेक्षाकृत दुर्लभ रहा है.''
''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले 12 वर्षों से सत्ता में रही बीजेपी ने केंद्र और राज्यों, दोनों स्तरों पर अभूतपूर्व राजनीतिक शक्ति हासिल की है. साथ ही, सरकार पर अपने आलोचकों और विरोधियों के ख़िलाफ़ लगातार कार्रवाई करने और उन्हें जेल भेजने के आरोप भी लगते रहे हैं, जिससे असहमति की गुंजाइश काफ़ी सीमित हो गई है.''

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'कॉकरोच पॉलिटिक्स कोई जोक नहीं'
बीजेपी सांसद कंगना रनौत ने भी प्रदर्शन की आलोचना करते हुए कहा, "कोई भी सरकार पर यह दबाव नहीं बना सकता कि वह किसे पद से हटाए और किसे बनाए रखे."
सीजेपी के इस आंदोलन को प्रसिद्ध इंजीनियर और सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक के अनशन से और बल मिला. छात्रों के समर्थन में उन्होंने घोषणा की थी कि जब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा नहीं देते, तब तक अनशन नहीं तोड़ेंगे. प्रदर्शन के समय तक उनका अनशन 21वें दिन में प्रवेश कर चुका था.
क़तर की न्यूज़ वेबसाइट अल-जज़ीरा ने अशोका यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के टीचर उदय चंद्रा का एक लेख प्रकाशित किया है. इस आर्टिकल में उदय चंद्रा ने लिखा है, ''भारत में सीजेपी के वायरल होने के दो महीने बाद उसका आंदोलन अब एक नए और अधिक टकरावपूर्ण दौर में प्रवेश कर गया है.''
उदय चंद्रा ने लिखा है, ''शनिवार को हालात बिगड़ने से पहले सरकार की प्रतिक्रिया न तो पूरी तरह आंदोलन के प्रति नरम थी और न ही पूर्ण दमनकारी. उसकी रणनीति सीमित दायरे में प्रदर्शन की अनुमति देने, उस पर निगरानी रखने और समय के साथ आंदोलन के कमज़ोर पड़ने का इंतज़ार करने की थी. लेकिन अब ऐसा लगता है कि सीजेपी ने सत्ता पक्ष को असहज कर दिया है.''

''अब सीजेपी को भारत की भीड़भाड़ वाली और अस्थिर राजनीति में सोशल मीडिया से जन्मे किसी क्षणिक व्यंग्यात्मक युवा अभियान के रूप में देखना मुश्किल हो गया है, जो कुछ समय के लिए सड़कों पर दिखाई दे और फिर जल्दी ही ग़ायब हो जाए. "कॉकरोच" का यह प्रतीक इसलिए आगे बढ़ा क्योंकि उसने समाज में मौजूद व्यापक असंतोष को एक पहचान दी.''
उदय चंद्रा ने लिखा है, ''किसी को "कॉकरोच" कहना यह संकेत देता है कि वह गंदा है, महत्वहीन है और उसे नज़रों से दूर रखा जाना चाहिए. कॉकरोच को आमतौर पर एक बदसूरत, हास्य का पात्र और समाज के हाशिये पर रहने वाले जीव के रूप में देखा जाता है. उससे घृणा की जाती है, उसे मारना आसान नहीं होता और वह समाज की दरारों में जीवित रहता है. वह ज़हर, अंधेरे और तिरस्कार के बावजूद बचा रहता है और तब दिखाई देता है, जब किसी घर की वास्तविक स्थिति उसके मालिकों के दावों से अलग होती है.''
उदय चंद्रा ने लिखा है, ''कई युवा भारतीयों, ख़ासकर बेरोज़गारी, प्रश्नपत्र लीक और बढ़ती महंगाई से जूझ रहे लोगों के लिए, यह अपमान उसी भावना का प्रतीक बन गया, जिसे वे पहले से महसूस कर रहे थे. सीजेपी ने इस अपमान को पहचान और दृश्यता में बदल दिया. उनका संदेश था कि अगर सत्ता हमें इसी नज़र से देखती है, तो हम इसी पहचान के साथ अपनी आवाज़ उठाएंगे. इस तरह एक अपमानजनक शब्द गर्व के प्रतीक में बदल गया. पारंपरिक अर्थों में कोई क्रांतिकारी राजनीति नहीं, बल्कि एक दुखांत-व्यंग्य है, क्योंकि "कॉकरोच" उस भारत का प्रतीक बन गया है, जहां सामाजिक और आर्थिक उन्नति के बड़े सपने अधूरे रह गए हैं.''
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